कभी तो दुनिया चलाते हैं ये रिश्ते
और कभी दुनिया जलाते हैं ये रिश्ते.
सात समंदर की दूरी भी समेट लेते हैं ये कभी,
और कभी जली रोटी पर क़ुर्बान हो जाते हैं ये रिश्ते.
जान दे कर भी निभाए जाते हैं ये कभी ,
और काग़ज़ के टुकड़ों के लिए टूट जाते हैं ये रिश्ते.
कोई यूँ तन्हा कि रिश्ते नहीं हैं निभाने को
कोई रिश्तों की भीड़ में हो कर भी है तन्हा....
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