Monday, December 1, 2014

वक़्त और ज़िंदगी


कभी तो वक़्त वहीं थम जाता,
और आदमी आगे निकल जाता है.

और कभी पलक झपकने से पहले,
मंज़र बदल जाता है.

गर वक़्त और ज़िंदगी साथ साथ चल देते,
तो ए खुदा इसमें तेरा क्या बिगड़ जाता है...

Thursday, November 13, 2014

खुदा या शैतान


एक दिन हुआ गुमाँ क़ि हम खुदा हो गये
जो चाहा वो मिला, जो सोचा वो हुआ
पीतल से सोना बना जिसे भी हमने छुआ
अपनी हस्ती एहसान; औरों के वजूद, गुनाह हो गये.

दूसरों का मुक़द्दर लिखने का जुनून छाने लगा,
झुके हुए सर देख कर, मज़ा सा आने लगा,
इंसानियत के आखरी एहसास भी हवा हो गये
एक दिन हुआ गुमाँ क़ि हम खुदा हो गये.

इसी नशे में चूर, अपनी धुन में हम सवार थे,
एक बच्चा ग़लती से सामने आया कार के,
गालियाँ देते हुए, एक थप्पड़ उसे जड़ दिया,
जानता नही मैं कौन हूँ, चुभो ये नश्तर दिया.

सहमा सा वो बच्चा, सुबक कर कहने लगा,
अभी खुदा से मिला था, जिसने मुझे खाना दिया,
आपने गिरा दिया, तो आप शैतान हो गये.
एक दिन हुआ गुमाँ क़ि हम खुदा हो गये.

Friday, November 7, 2014

जंग


दिलो दिमाग़ में बेतरहा जंग ज़ारी है,
आज एक ने दाव जीता,
कल शायद दूजे की बारी है....

किस की मानूं, किसे ठुकराऊ,
दोनो ही तो अपने हैं....
इसी उलझन में बीती जाती उम्र ये सारी है.

Sunday, November 2, 2014

सपने


आओ कुछ सपने बोते हैं...

जैसा जग हम सोचते हैं
जैसा जग हम चाहते हैं
वो सच से बहुत दूर है
और राह कठिन ज़रूर है

उस राह पर कभी,
साथी भी अपने खोते हैं.
आओ कुछ सपने बोते हैं...

सच और सपने के बीच का
समय है भैया बड़ा निराला
उसे परीक्षा कहते हैं
बड़ा कड़वा उसका निवाला

परीक्षा के डर से कभी,
क्या हौसले रोते हैं.
आओ कुछ सपने बोते हैं...

परीक्षा है हर श्वास की
हर आम की, हर ख़ास की
हताशा की, उल्लास की
उस अडिग विश्वास की

विश्वास हो गर खुद पर,
सपने भी सच होते हैं.
आओ कुछ सपने बोते हैं...

ढंग निराले दुनिया के


बराबरी एक मिथ्या है
और न्याय मृगतृष्णा है

ये दुनिया का जो मेला है
सब अभिमानों का खेला है

जब तक दो इंसान हैं
तब तक दो अभिमान हैं

मैं पुरुष हूँ, मुझको क्या डर है
मैं स्त्री हूँ, ये मेरा घर है

मेरा धर्म है सबसे महान
बाकी सब अनपढ़ नादान

मैं गोरा हूँ, सबसे ऊपर
ज़रा आना तुम सामने झुककर

मेरे पास है पैसा पैसा
तेरा वजूद है क्या और कैसा

तुम जो बराबरी माँगते हो
इंसानियत की रट हांकते हो

तुमसे पूछूँ, तुम बतलाओ
अपना न्याय हमें दिखाओ

क्या दोनो हाथ बराबर हैं
या एक ज़्यादा प्यारा है
क्या दोनो आँख बराबर हैं
या एक का खोना गवारा है

दुनिया का यही उसूल है
जो ताक़तवर वही क़ुबूल है..

ये होता तो क्या होता, वो होता तो क्या होता


वक़्त बदला, दिन रात बदले
चेहरे बदले और हाथ बदले..

रिश्ते बदले, जज़्बात बदले
इंसान बदला, हालात बदले..

साँस लेने की तो फ़ुर्सत नहीं
बीते पलों की याद को,
कौन अपनी याददाश्त बदले..

बहुत कुछ करने की क़सक
आज भी जवां है दिल में ,
गर अपनी भी औकात बदले....

Saturday, October 25, 2014

प्रार्थना : कितनी सच्ची कितनी झूठी


हम जब मंदिर जाते हैं,
क्या मन भी साथ जाता है.
या चप्पल के मोह में,
बाहर ही अटक जाता है..

ध्यान भक्ति में मगन हो जाए,
बिना चप्पल का विचार करे.
इस दीवाली प्रभु ऐसा चमत्कार करें,
और आपकी आशायें साकार करें.

Thursday, October 16, 2014

दुखती रग़


लाले तो हैं रोटी के,
पर मन है उड़ान खटोले पर...
कुछ किया भी ना जाए
और सहा भी ना जाए.

कल हो ना हो


कुछ कम मिलता है,
कुछ देर से मिलता है,
कुछ नहीं मिलता है और,
कुछ मिल के भी काम नहीं आता....

क्या मिला, क्या ना मिला,
ये क्यूँ मिला, वो क्यूँ ना मिला,
उसे क्यूँ मिला, मुझे क्यूँ ना मिला,
नहीं मिला तो क्या हुआ, मिलता तो क्या होता...

क्या सोचना, क्यूँ रोना,
इस पल का आनंद क्यूँ खोना,
एक आज मिला है खुल के जियो,
क्या पता कल हो ना हो!!!

Wednesday, October 15, 2014

ओ पिलानी - 2


कदम थम गये
रुक गयी हैं राहें
ऐसा क्यूँ लगे है मुझे,
कोई पुकार रहा,
फैला कर अपनी बाहें...

मैं तो हूँ सात समंदर पार
यहाँ तो कोई आता नही
क्यूँ लगने लगा अचानक,
इन राहों से अब मेरा नाता नही...

एक ठंडी हवा का झोंका
हल्के से गुदगुदा गया
जैसे सदियों के बाद
कोई बिछड़ा याद आ गया...

क्या यह तुम हो?
सुन कर जिसकी सदा
भीड़ में हूँ, पर हो गया सबसे जुदा...

तुम तो मेरी नसों में बसे हो,
तुम से जुदा मैं हुआ ना कभी
तो क्यूँ तुम्हारी यादों का सैलाब,
तोड़ रहा आज साहिल सभी...

तुझे देखने की आरज़ू
तुझसे मिलने की आस लिए,
आ रहा हूँ फिर एक बार
साँसों में तेरी खुश्बू का एहसास लिए...

और साथ अपने ला रहा हूँ, किसी को तुझसे मिलाने
ये है मेरा आने वाला कल, जो देगा अपने रिश्ते को नये माने...

तेरी यादें
तेरी यादें...

कभी कैसे हों पुरानी...

ओ पिलानी
ओ, पिलानी...

ओ पिलानी - 1


हवाई जहाज़ों में उड़ते फिरते हो
लंबी गाड़ियाँ चलाते हो
बड़ी बड़ी कंपनियाँ चलाकर,
दुनिया का मुक़द्दर बनाते हो

देश तो क्या विदेशों में भी,
अपने नाम से जाने जाते हो....

सब खुश हैं, सब आबाद हैं,
कुछ परिवारवाले… तो कुछ आज़ाद हैं !!!

कब लम्हे दिनों में, और दिन सालों में बदल जाते होंगे,
अपनों के लिए तो क्या, अपने लिए भी पल ना निकल पाते होंगे,
वो छोटी सड़कें, वो कच्चे रास्ते, तो खैर अब कहाँ भाते होंगे…
ऐसे में मैं सोचूँ क़ि मुझे याद कर लो , तो सदके पे पुराने नाते होंगे !!!

पर सच बतलाना,
क्या ऐसा कभी ना हुआ,
लगा क़ि कोई जाना पहचाना सा हवा का झोंका है छुआ,

किसी बड़े होटल का लज़ीज़ खाना अचानक कड़वा लग गया,
क्योंकि एक 5 रुपये की रबड़ी का स्वाद, था मुँह में जग गया !!!

तुम मुझे भूले नही, मैं अब भी तुम में कहीं वाबस्ता हूँ,
तुमसे तो कम, पर हाँ, वक़्त के साथ मैं भी थोड़ा बदला हूँ!!!

आओ, मिल जाओ फिर से एक बार,
मैं तो वहीं हूँ, बैठा हूँ बाहें पसार……

चलो एक दूसरे के नये रूप को जानें,
और एक पुराने रिश्ते को दें हम नये माने,
क्यूँ क़ि कोई चाहे तो भी टूटेगा ना ये तोड़ने को,
क़ि तुम्हारी अगली पीढ़ी है हो रही तैयार
मुझसे रिश्ता जोड़ने को!!!

Tuesday, October 14, 2014

आज के सिकंदर


तुम हो गये हो आसमाँ से भी ऊँचे,
क़ि दिखते नहीं ज़मीं के लोग...
हमने उस शख्स को भी देखा है
जो ख़ुद को कहता था सिकंदर,
दफ़न पड़ा है इसी मिट्टी में
ना जाने यहीं कहीं....

Monday, October 13, 2014

चाय और ज़िंदगी

चाय के उबलते प्याले को गौर से देखा है जनाब?

जीवन का हर रंग दिखेगा.

दिखेगा...

घना धुँधलका
थोड़ी सी रोशनी से मिल कर,
कैसे एक मनमोहिनी शाम सा श्यामल हो जाता है...

प्रवृति की कड़वाहट
थोड़ी सी मिठास से मिल कर,
कैसे मृत्यूंजई अनुभव बन जाती है....

ठाठें मारता उफान
थोड़ा समय देने पर,
कैसे सागर सा निर्मल हो जाता है.....

विष और अमृत
विश्वास और प्रयास की छलनी से,
कैसे अलग हो जाते हैं....

इसलिए कहता हूँ क़ि.....
चाय पीजिए जनाब
और जो मनुहार से चाय पिलाते हैं,
उनका सम्मान कीजिए जनाब !!!!

रमता जोगी


जब तक हम सयाने थे, अपने भी बेगाने थे,
जोगी जब से हो गये, हो गये ज़माने के...

आप तो ऐसे ना थे

ज़िंदगी बड़ी है और दुनिया गोल,
कभी तो मिलोगे फ़ुर्सत में..
पूछेंगे, हाल कैसा है जनाब का !!!