Wednesday, October 15, 2014

ओ पिलानी - 1


हवाई जहाज़ों में उड़ते फिरते हो
लंबी गाड़ियाँ चलाते हो
बड़ी बड़ी कंपनियाँ चलाकर,
दुनिया का मुक़द्दर बनाते हो

देश तो क्या विदेशों में भी,
अपने नाम से जाने जाते हो....

सब खुश हैं, सब आबाद हैं,
कुछ परिवारवाले… तो कुछ आज़ाद हैं !!!

कब लम्हे दिनों में, और दिन सालों में बदल जाते होंगे,
अपनों के लिए तो क्या, अपने लिए भी पल ना निकल पाते होंगे,
वो छोटी सड़कें, वो कच्चे रास्ते, तो खैर अब कहाँ भाते होंगे…
ऐसे में मैं सोचूँ क़ि मुझे याद कर लो , तो सदके पे पुराने नाते होंगे !!!

पर सच बतलाना,
क्या ऐसा कभी ना हुआ,
लगा क़ि कोई जाना पहचाना सा हवा का झोंका है छुआ,

किसी बड़े होटल का लज़ीज़ खाना अचानक कड़वा लग गया,
क्योंकि एक 5 रुपये की रबड़ी का स्वाद, था मुँह में जग गया !!!

तुम मुझे भूले नही, मैं अब भी तुम में कहीं वाबस्ता हूँ,
तुमसे तो कम, पर हाँ, वक़्त के साथ मैं भी थोड़ा बदला हूँ!!!

आओ, मिल जाओ फिर से एक बार,
मैं तो वहीं हूँ, बैठा हूँ बाहें पसार……

चलो एक दूसरे के नये रूप को जानें,
और एक पुराने रिश्ते को दें हम नये माने,
क्यूँ क़ि कोई चाहे तो भी टूटेगा ना ये तोड़ने को,
क़ि तुम्हारी अगली पीढ़ी है हो रही तैयार
मुझसे रिश्ता जोड़ने को!!!

No comments:

Post a Comment