Saturday, October 25, 2014

प्रार्थना : कितनी सच्ची कितनी झूठी


हम जब मंदिर जाते हैं,
क्या मन भी साथ जाता है.
या चप्पल के मोह में,
बाहर ही अटक जाता है..

ध्यान भक्ति में मगन हो जाए,
बिना चप्पल का विचार करे.
इस दीवाली प्रभु ऐसा चमत्कार करें,
और आपकी आशायें साकार करें.

Thursday, October 16, 2014

दुखती रग़


लाले तो हैं रोटी के,
पर मन है उड़ान खटोले पर...
कुछ किया भी ना जाए
और सहा भी ना जाए.

कल हो ना हो


कुछ कम मिलता है,
कुछ देर से मिलता है,
कुछ नहीं मिलता है और,
कुछ मिल के भी काम नहीं आता....

क्या मिला, क्या ना मिला,
ये क्यूँ मिला, वो क्यूँ ना मिला,
उसे क्यूँ मिला, मुझे क्यूँ ना मिला,
नहीं मिला तो क्या हुआ, मिलता तो क्या होता...

क्या सोचना, क्यूँ रोना,
इस पल का आनंद क्यूँ खोना,
एक आज मिला है खुल के जियो,
क्या पता कल हो ना हो!!!

Wednesday, October 15, 2014

ओ पिलानी - 2


कदम थम गये
रुक गयी हैं राहें
ऐसा क्यूँ लगे है मुझे,
कोई पुकार रहा,
फैला कर अपनी बाहें...

मैं तो हूँ सात समंदर पार
यहाँ तो कोई आता नही
क्यूँ लगने लगा अचानक,
इन राहों से अब मेरा नाता नही...

एक ठंडी हवा का झोंका
हल्के से गुदगुदा गया
जैसे सदियों के बाद
कोई बिछड़ा याद आ गया...

क्या यह तुम हो?
सुन कर जिसकी सदा
भीड़ में हूँ, पर हो गया सबसे जुदा...

तुम तो मेरी नसों में बसे हो,
तुम से जुदा मैं हुआ ना कभी
तो क्यूँ तुम्हारी यादों का सैलाब,
तोड़ रहा आज साहिल सभी...

तुझे देखने की आरज़ू
तुझसे मिलने की आस लिए,
आ रहा हूँ फिर एक बार
साँसों में तेरी खुश्बू का एहसास लिए...

और साथ अपने ला रहा हूँ, किसी को तुझसे मिलाने
ये है मेरा आने वाला कल, जो देगा अपने रिश्ते को नये माने...

तेरी यादें
तेरी यादें...

कभी कैसे हों पुरानी...

ओ पिलानी
ओ, पिलानी...

ओ पिलानी - 1


हवाई जहाज़ों में उड़ते फिरते हो
लंबी गाड़ियाँ चलाते हो
बड़ी बड़ी कंपनियाँ चलाकर,
दुनिया का मुक़द्दर बनाते हो

देश तो क्या विदेशों में भी,
अपने नाम से जाने जाते हो....

सब खुश हैं, सब आबाद हैं,
कुछ परिवारवाले… तो कुछ आज़ाद हैं !!!

कब लम्हे दिनों में, और दिन सालों में बदल जाते होंगे,
अपनों के लिए तो क्या, अपने लिए भी पल ना निकल पाते होंगे,
वो छोटी सड़कें, वो कच्चे रास्ते, तो खैर अब कहाँ भाते होंगे…
ऐसे में मैं सोचूँ क़ि मुझे याद कर लो , तो सदके पे पुराने नाते होंगे !!!

पर सच बतलाना,
क्या ऐसा कभी ना हुआ,
लगा क़ि कोई जाना पहचाना सा हवा का झोंका है छुआ,

किसी बड़े होटल का लज़ीज़ खाना अचानक कड़वा लग गया,
क्योंकि एक 5 रुपये की रबड़ी का स्वाद, था मुँह में जग गया !!!

तुम मुझे भूले नही, मैं अब भी तुम में कहीं वाबस्ता हूँ,
तुमसे तो कम, पर हाँ, वक़्त के साथ मैं भी थोड़ा बदला हूँ!!!

आओ, मिल जाओ फिर से एक बार,
मैं तो वहीं हूँ, बैठा हूँ बाहें पसार……

चलो एक दूसरे के नये रूप को जानें,
और एक पुराने रिश्ते को दें हम नये माने,
क्यूँ क़ि कोई चाहे तो भी टूटेगा ना ये तोड़ने को,
क़ि तुम्हारी अगली पीढ़ी है हो रही तैयार
मुझसे रिश्ता जोड़ने को!!!

Tuesday, October 14, 2014

आज के सिकंदर


तुम हो गये हो आसमाँ से भी ऊँचे,
क़ि दिखते नहीं ज़मीं के लोग...
हमने उस शख्स को भी देखा है
जो ख़ुद को कहता था सिकंदर,
दफ़न पड़ा है इसी मिट्टी में
ना जाने यहीं कहीं....

Monday, October 13, 2014

चाय और ज़िंदगी

चाय के उबलते प्याले को गौर से देखा है जनाब?

जीवन का हर रंग दिखेगा.

दिखेगा...

घना धुँधलका
थोड़ी सी रोशनी से मिल कर,
कैसे एक मनमोहिनी शाम सा श्यामल हो जाता है...

प्रवृति की कड़वाहट
थोड़ी सी मिठास से मिल कर,
कैसे मृत्यूंजई अनुभव बन जाती है....

ठाठें मारता उफान
थोड़ा समय देने पर,
कैसे सागर सा निर्मल हो जाता है.....

विष और अमृत
विश्वास और प्रयास की छलनी से,
कैसे अलग हो जाते हैं....

इसलिए कहता हूँ क़ि.....
चाय पीजिए जनाब
और जो मनुहार से चाय पिलाते हैं,
उनका सम्मान कीजिए जनाब !!!!

रमता जोगी


जब तक हम सयाने थे, अपने भी बेगाने थे,
जोगी जब से हो गये, हो गये ज़माने के...

आप तो ऐसे ना थे

ज़िंदगी बड़ी है और दुनिया गोल,
कभी तो मिलोगे फ़ुर्सत में..
पूछेंगे, हाल कैसा है जनाब का !!!