Thursday, March 12, 2015

पर...

मैं दुनिया घूमना चाहता हूँ पर..
मैं बेपरवाह झूमना चाहता हूँ पर..

मैं सपने पीना चाहता हूँ पर..
मैं खुल के जीना चाहता हूँ पर..

मैं दुख हरना चाहता हूँ पर..
मैं खुशियाँ भरना चाहता हूँ पर..

मैं इंसान बनाना चाहता हूँ पर..
मैं अमन लाना चाहता हूँ पर..

एक छोटा सा है ये पर,
बन गया है कितना ताक़तवर !!!

ये पर, क्यूँ मेरी राह में है रोड़े अटकाता,
ये पर, पर लगा कर उड़ क्यूँ नहीं जाता...

Saturday, February 7, 2015

ज़िंदगी - लंबी या बड़ी?

जितना जी लिया, उससे शायद कम बाकी है,
कितनी खुशियाँ अभी बाकी हैं,
ना जाने कितने गम बाकी हैं...

तुझे बेपनाह जीता रहूँगा, ये इरादा है ज़िंदगी,
आखरी साँस बाकी है जब तक,
जब तक आखरी दम बाकी है !!!

Tuesday, February 3, 2015

रिश्ते....



कभी तो दुनिया चलाते हैं ये रिश्ते
और कभी दुनिया जलाते हैं ये रिश्ते.

सात समंदर की दूरी भी समेट लेते हैं ये कभी,
और कभी जली रोटी पर क़ुर्बान हो जाते हैं ये रिश्ते.

जान दे कर भी निभाए जाते हैं ये कभी ,
और काग़ज़ के टुकड़ों के लिए टूट जाते हैं ये रिश्ते.

कोई यूँ तन्हा कि रिश्ते नहीं हैं निभाने को
कोई रिश्तों की भीड़ में हो कर भी है तन्हा....

Monday, December 1, 2014

वक़्त और ज़िंदगी


कभी तो वक़्त वहीं थम जाता,
और आदमी आगे निकल जाता है.

और कभी पलक झपकने से पहले,
मंज़र बदल जाता है.

गर वक़्त और ज़िंदगी साथ साथ चल देते,
तो ए खुदा इसमें तेरा क्या बिगड़ जाता है...

Thursday, November 13, 2014

खुदा या शैतान


एक दिन हुआ गुमाँ क़ि हम खुदा हो गये
जो चाहा वो मिला, जो सोचा वो हुआ
पीतल से सोना बना जिसे भी हमने छुआ
अपनी हस्ती एहसान; औरों के वजूद, गुनाह हो गये.

दूसरों का मुक़द्दर लिखने का जुनून छाने लगा,
झुके हुए सर देख कर, मज़ा सा आने लगा,
इंसानियत के आखरी एहसास भी हवा हो गये
एक दिन हुआ गुमाँ क़ि हम खुदा हो गये.

इसी नशे में चूर, अपनी धुन में हम सवार थे,
एक बच्चा ग़लती से सामने आया कार के,
गालियाँ देते हुए, एक थप्पड़ उसे जड़ दिया,
जानता नही मैं कौन हूँ, चुभो ये नश्तर दिया.

सहमा सा वो बच्चा, सुबक कर कहने लगा,
अभी खुदा से मिला था, जिसने मुझे खाना दिया,
आपने गिरा दिया, तो आप शैतान हो गये.
एक दिन हुआ गुमाँ क़ि हम खुदा हो गये.

Friday, November 7, 2014

जंग


दिलो दिमाग़ में बेतरहा जंग ज़ारी है,
आज एक ने दाव जीता,
कल शायद दूजे की बारी है....

किस की मानूं, किसे ठुकराऊ,
दोनो ही तो अपने हैं....
इसी उलझन में बीती जाती उम्र ये सारी है.

Sunday, November 2, 2014

सपने


आओ कुछ सपने बोते हैं...

जैसा जग हम सोचते हैं
जैसा जग हम चाहते हैं
वो सच से बहुत दूर है
और राह कठिन ज़रूर है

उस राह पर कभी,
साथी भी अपने खोते हैं.
आओ कुछ सपने बोते हैं...

सच और सपने के बीच का
समय है भैया बड़ा निराला
उसे परीक्षा कहते हैं
बड़ा कड़वा उसका निवाला

परीक्षा के डर से कभी,
क्या हौसले रोते हैं.
आओ कुछ सपने बोते हैं...

परीक्षा है हर श्वास की
हर आम की, हर ख़ास की
हताशा की, उल्लास की
उस अडिग विश्वास की

विश्वास हो गर खुद पर,
सपने भी सच होते हैं.
आओ कुछ सपने बोते हैं...