Sunday, November 2, 2014

सपने


आओ कुछ सपने बोते हैं...

जैसा जग हम सोचते हैं
जैसा जग हम चाहते हैं
वो सच से बहुत दूर है
और राह कठिन ज़रूर है

उस राह पर कभी,
साथी भी अपने खोते हैं.
आओ कुछ सपने बोते हैं...

सच और सपने के बीच का
समय है भैया बड़ा निराला
उसे परीक्षा कहते हैं
बड़ा कड़वा उसका निवाला

परीक्षा के डर से कभी,
क्या हौसले रोते हैं.
आओ कुछ सपने बोते हैं...

परीक्षा है हर श्वास की
हर आम की, हर ख़ास की
हताशा की, उल्लास की
उस अडिग विश्वास की

विश्वास हो गर खुद पर,
सपने भी सच होते हैं.
आओ कुछ सपने बोते हैं...

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