Sunday, November 2, 2014

ढंग निराले दुनिया के


बराबरी एक मिथ्या है
और न्याय मृगतृष्णा है

ये दुनिया का जो मेला है
सब अभिमानों का खेला है

जब तक दो इंसान हैं
तब तक दो अभिमान हैं

मैं पुरुष हूँ, मुझको क्या डर है
मैं स्त्री हूँ, ये मेरा घर है

मेरा धर्म है सबसे महान
बाकी सब अनपढ़ नादान

मैं गोरा हूँ, सबसे ऊपर
ज़रा आना तुम सामने झुककर

मेरे पास है पैसा पैसा
तेरा वजूद है क्या और कैसा

तुम जो बराबरी माँगते हो
इंसानियत की रट हांकते हो

तुमसे पूछूँ, तुम बतलाओ
अपना न्याय हमें दिखाओ

क्या दोनो हाथ बराबर हैं
या एक ज़्यादा प्यारा है
क्या दोनो आँख बराबर हैं
या एक का खोना गवारा है

दुनिया का यही उसूल है
जो ताक़तवर वही क़ुबूल है..

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